71 : मुक्त-ग़ज़ल - है अब तो घी.................


है अब तो घी में आलुओं के मिश्र का चलन ॥
होगा कभी विशुद्ध का पवित्र का चलन ॥
था बुद्ध का मत.....मत सुगंधियाँ प्रयुक्त हों ,
चेलों में ही अब उनके चरम इत्र का चलन ॥
सावित्रियाँ कहानियों से लुप्त हो चलीं ,
वारांगनाओं जैसे अब चरित्र का चलन ॥
होती थीं बस सहेलियाँ महिलाओं की पहले ,
अब तो अगल बगल में पुरुष मित्र का चलन ॥
अब भाई-भाई........भाई के जैसे कहाँ रहे ,
न राम का चलन है न सौमित्र का चलन ॥
लिम्का-गिनीज़ बुक में नाम को मनुष्य में ,
कुछ ऊट कुछ पटांग कुछ विचित्र का चलन ॥
पर्दे से ही हो जाता अगर हुस्न नुमायाँ ,
होता कभी न बेलिबास चित्र का चलन ॥
सौतेले बहन भाई की बातें हैं पुरानी ,
संदेह है चल जाये न वैपित्र का चलन ॥
(वारांगना=वैश्या,सौमित्र=लक्ष्मण,वैपित्र=जैसे किसी की सौतेली माँ होती है वैसे पिता)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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