70 : मुक्त-ग़ज़ल - बात कर कर के.................


बात कर कर के बड़ी से भी बड़ी ॥
मुझसे करते रहे वो धोखा धड़ी ॥
मुझको फाँसा है यों मोहब्बत में ,
एक मक्खी को जिस तरह मकड़ी ॥
प्यार जिसमें हुआ था उनसे कभी ,
कोसते हैं वो सबसे प्यारी घड़ी ॥
मेरी इज्ज़त से खेल कूद की यों ,
उछल के उनकी भी गिरी पगड़ी ॥
उसको इनआम वो दे बैठे हैं ,
जिसको देना था सज़ा खूब कड़ी ॥
मौत जबसे पसंद की मैंने ,
ज़िंदगी हाथ धोके पीछे पड़ी ॥
साथ उनके जो उड़ती फिरती थी ,
ज़िंदगानी बग़ैर उनके खड़ी ॥
ऐसे हालात में मरे कि उठा ,
न जनाज़ा न लगी अश्क़ झड़ी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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