69 : मुक्त-ग़ज़ल - छोटे बड़े हर इक............


छोटे बड़े हर इक इंसाँ के अपने सपने होते हैं ॥
ज़्यादा के रह जाते हैं आधे कुछ के पूरे होते हैं ॥
जो दिखता है बस उसकी ही वाह वाह करती दुनिया ,
बुनियादी पत्थर पे सब चुप कलश के चर्चे होते हैं ॥
हमने तो अब उनमें भी तहजीब नदारद देखी है ,
जो दुनिया की नज़र में ऊँचे खानदान के होते हैं ।
ये मज़ार मंदिर रस्तों के अगल बगल में ठीक नहीं ,
रोज़ हादसे ड्राइवरों से शीश नवाते होते हैं ॥
चालबाज़ सिंदूर पोतकर इक पत्थर रख देते हैं ,
यूँ ज़मीं के कितने टुकड़ों पर बेजा कब्ज़े होते हैं ॥
कुछ लंगूर हूर सी बीवी के होते तो हैं मालिक ,
पर जैसे वो उसके चौकीदार सरीख़े होते हैं ॥
आज अभी हो जाने वाले साल साल पे टलते हैं ,
वक़्त पे काम कहाँ सरकारी बिन रिश्वत के होते हैं ॥
मजदूरों के ख़ून की क़ीमत पानी जैसी होती है ,
नामावर लोगों के पसीने इत्र से महँगे होते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

sriram said…
बहुत सुन्दर ख्यालात ......

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