68 : मुक्त-ग़ज़ल - मेरे दिल को किराये............


मेरे दिल को किराये की इमारत की तो थी उसने ॥
चलो झूठी सही लेकिन मोहब्बत की तो थी उसने ॥
मेरे रोने की हँसने की उसे अब कुछ नहीं पर्वा ,
कभी मेरे लिए दिन रात इबादत की तो थी उसने ॥
नहीं ताल्लुक़ कोई मुझसे उसे आज ऐसी नौबत है ,
कभी हर रोज़ ही ख़त-ओ-क़िताबत की तो थी उसने ॥
बयाँ मेरे खिलाफ़ अपने वो देते आज फिरता है ,
तसल्ली है मेरी कल तक हिमायत की तो थी उसने ॥
ज़रा सी भूल पर आज उसने दे दी इक सज़ा तो क्या ?
कई संगीं गुनाहों पर मुरव्वत की तो थी उसने ॥
नहीं लेकर खड़ा वो हार आज इस जीत पर मेरी ,
तो क्या हर बात पर कल तक तो इज़्ज़त की तो थी उसने ॥
नहीं शामिल हुआ मेरे जनाज़े में तो क्या रोना ,
कभी सर्दी में खाँसी में भी शिरक़त की तो थी उसने ॥
नहीं वो बन सका मेरा शरीके ज़िंदगी लेकिन ,
लिपट कर मुझसे भी रोकर ही रुख़सत की तो थी उसने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


Comments

बहुत उम्दा ग़ज़ल !!
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok ' जी !

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक