65 : मुक्त-ग़ज़ल - किस काम के लिए..............


किस काम के लिए नहीं तैयार रहे हम  ?
फ़िर भी तो मुद्दतों तक बेकार रहे हम ॥
वो चुस्ती वो फुर्ती वो उछल कूद न रही ,
मुद्दत तक अस्पताल के बीमार रहे हम ॥
लड़ने न दिया जब तलक था दम में दम उन्हें ,
दोनों के बीच चीन की दीवार रहे हम ॥
मिलते थे जिससे पुल वो कल की रात ढह गया ,
उस तरफ़ रह गए वो इस पार रहे हम ॥
सद बार किया इश्क़ मगर हाय री क़िस्मत ,
इस बार क्या नाकाम हर इक बार रहे हम ॥
तमगे न वफ़ादारियों कुर्बानियों के दो ,
मुफ़लिस हैं तो क्या मुल्क के ग़द्दार रहे हम ॥
उसने हमारे बख़्श दिये सब गुनाह जब ,
ताउम्र उसके आगे शर्मसार रहे हम ॥
जो थे हमारे वास्ते मछली के समन्दर ,
उनके लिए कभी भी न दरकार रहे हम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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