62 : मुक्त-ग़ज़ल - उन्हे प्यार मैं..............


उन्हें प्यार मैं जब से करने लगा हूँ ॥
यक़ीनन ही कुछ कुछ बदलने लगा हूँ ॥
धुआँ कर रहा था मैं तन्हाइयों में ,
सरे बज़्म आकर धधकने लगा हूँ ॥
बहुत डर के चलता था हालात से मैं ,
अब इन शेर चीतों से लड़ने लगा हूँ ॥
मेरी कट गईं जब से दोनों ही टाँगें ,
मैं अब और भी तेज़ चलने लगा हूँ ॥
नहीं मिल रही जब दवा ही कहीं से ,
दवा दर्द को ही समझने लगा हूँ ॥
बहुत शुक्रिया उनकी फ़र्माइशों का ,
निठल्ला कमाने निकलने लगा हूँ ॥
न थे ग़म तो मैं शेर कह पाता कैसे ,
पर अब शेर पर शेर कहने लगा हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Brijesh Singh said…
बहुत सुन्दर!
धन्यवाद ! Brijesh Singh जी !
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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