61 : मुक्त-ग़ज़ल - कमरे मिलते हैं............

कमरे मिलते हैं घर नहीं मिलते ॥

खूब ढूँढो मगर नहीं मिलते ॥
शोरगुल भाग दौड़ से खाली ,
आज कोई शहर नहीं मिलते ॥
मुफ़्त नुस्खा ही लिख दें मुफ़्लिस को ,
ऐसे अब डॉक्टर नहीं मिलते ॥
दिल भी चेहरों से उजले रोशन हों ,
लोग अपने इधर नहीं मिलते ॥
पाप करते न हाथ क्यूँ काँपे ,
बददुआ में असर नहीं मिलते ॥
दोस्त अब हाथ भर मिलाते हैं ,
अब गले दौड़कर नहीं मिलते ॥
क्या दवाओं की हम कहें यारों ,
अब निखालिस जहर नहीं मिलते ॥
लोग दिखते हैं ज़बर्दस्त मगर ,
अंदरूनी ज़बर नहीं मिलते ॥
( ज़बर=शक्तिशाली )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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