59: मुक्त-ग़ज़ल - ज़रा सी खता...............


ज़रा सी ख़ता की सज़ा ऐसी पाई ॥
ओ रब्बा दुहाई , दुहाई , दुहाई ॥
गुनाहों की दल दल में कुछ यूँ फँसे हम ,
कि मरकर ही फ़िर जान अपनी बचाई ॥
वो बहरे नहीं हैं कि हैं हम ही पागल ,
जो नक़्क़ार ख़ाने में तूती बजाई ॥
वो सावन के अंधे हैं देखें जिधर भी ,
उन्हे बस हरा ही हरा दे दिखाई ॥
समझने दो उनको समझना है जो कुछ ,
नहीं शक़ की दुनिया में कोई दवाई ॥
मेरी मौत का उनको सचमुच है सदमा ,
तभी तो अभी तक न फूटी रुलाई ॥
जब अच्छा ही अच्छा किया तो ये जाना ,
कि अच्छाई सबसे बड़ी है बुराई ॥
शिकार उनको करने की आदत थी इतनी ,
न कोई मिला ख़ुद पे गोली चलाई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

gope mishra said…
अत सुन्दर अभिव्यक्ति
Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...
धन्यवाद ! Ghanshyam Kumar जी !

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