58 : मुक्त-ग़ज़ल - सर जो पत्थर..........


सर जो पत्थर से ये टकराके फट गया होता ॥
ज़िंदगानी का ये झंझट निपट गया होता ॥
मैं भी जो तेरा बुरा चाहने लगा होता ,
सर तेरा धड़ से चुटकियों में हट गया होता ॥
तुझसे आता है सनम मुझको हारने में मज़ा ,
वरना इक फूँक से पासा पलट गया होता ॥
बेवफ़ा मुझको चिढ़ाने पे क्यों तुला है तू ,
ग़ैर को चाहता तो कब का पट गया होता ॥
हर तरफ़ साँप, बिच्छू, शेर, लोमड़ी, गीदड़ ,
काश ये शहर न जंगल से सट गया होता ॥
ऐसी फिसलन पे तूने पाँव रख दिये थे ,अगर
तुझे सम्हालता तो मैं रिपट गया होता ॥
वो जो आए न अगर एन वक़्त पर होते ,
कुछ न कुछ हादसा ज़रूर घट गया होता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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