*मुक्त-मुक्तक : 131 - भूख जिसकी भी...............


भूख जिसकी भी लगे उसको मैं खाकर के रहूँ ॥
चाहता हूँ जो उसे हर हाल पाकर के रहूँ ॥
अब इसे ज़िद कहिए , कहिए ख़ब्त या मंज़िल की धुन ,
पाँव कट जाएँ तो सिर को मैं चलाकर के रहूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर....होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।।
पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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