*मुक्त-मुक्तक : 127 - जो कुछ भी था...........


जो कुछ भी था सब तेरी वजह 
दस्तयाब था ॥
नाकाम रह के भी मैं सबसे 
कामयाब था ॥
तू मेरा क्या दुश्मन हुआ 
मैं ख़ुद हुआ प्यासा ,
जो दूसरों की तिश्नगी को 
शीरीं आब था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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