*मुक्त-मुक्तक :126 - जिससे होता था..............


जिससे होता रहा मैं पार
 वो कश्ती न रही ॥
जिसमें रहता था मैं महफ़ूज़ 
वो बस्ती न रही ॥
आम इंसाँ हूँ न जी पाऊँ
 न मर भी मैं सकूँ ,
हो गया जह्र भी महँगा 
दवा सस्ती न रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...
धन्यवाद ! Ghanshyam kumar जी !
बहुत सुन्‍द्रर...दिल को छूने वाली...हीरालाल जी आपसे निवेदन है कि आप अपनी रचनाऍं हमें भेजिए...'बहुवचन' पत्रिका के लिए...
मेरा पता है.
डॉ.अमित विश्‍वास
सहायक संपादक
महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा-442005 (महाराष्‍ट्र)


धन्यवाद ! अमित विश्वास जी ! अवश्य ही प्रेषित करूँगा ।

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