*मुक्त-मुक्तक : 124 - गुंजाइशें ...............

गुंजाइशें बहुत हैं खुराफ़ात की यहाँ ॥
करते हैं बात गूँगे भी बेबात की यहाँ ॥
साँपों की तरह रेंगते हैं आड़े-टेढ़े लोग ,
चलने को ज़रुरत नहीं है लात की यहाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…

बहुत सुन्दर ...
पधारें "चाँद से करती हूँ बातें "
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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