*मुक्त-मुक्तक : 117 - सजावट के बिना...............


सजावट के बिना भी वो 
ज़माने को लुभाती है ॥
बड़ी ख़ामोशियों के साथ 
दुनिया को बुलाती है ॥
अजब है वो ग़ज़ब की 
ग़मज़दा जो दर्द में भीगी ,
कुछ ऐसे खिलखिलाती है
 कि पत्थर को रुलाती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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