*मुक्त-मुक्तक : 114 - सब कुछ ठोस................


सब कुछ ठोस कठोर ही न हो 
कुछ निश्चित तारल्य भी हो ॥
जीवन में कठिनाई रहे पर 
थोड़ा तो सारल्य भी हो ॥
मैं कब केवल अभिलाषी हूँ 
अमृत घट का हे ईश्वर ,
प्रत्युत उसमें औषधि जितना 
स्वयं कहूँ गारल्य भी हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

sriram said…
वाह ...भक्ति -भाव से पूर्ण ....
mass said…
ग़ज़ब का शब्द माधुर्य है

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