*मुक्त-मुक्तक : 110 - पाँव में फटते ज्यों..........

पाँव में फटते ज्यों आ जाती हैं ज़ुराबें नई ॥
ख़त्म होते ही ढलतीं प्यालों में शराबें नई ॥
कोई पन्ने भी पलटता नहीं है उनके मगर ,
उनकी छप छप के चली आती हैं किताबें नई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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