*मुक्त-मुक्तक : 105 - गर अपने ही...............


गर अपने ही कर्मों का 
नतीजा है सफलता ॥
फ़िर किसलिए करूँ मैं
 उसका शुक्रिया अता ?
बरबादियों का अपनी 
अगर ख़ुद ही सबब हूँ ,
क्यों गालियाँ बकूँ उसे 
उसको कहूँ बुरा ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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