*मुक्त-मुक्तक : 103 - इंसान ही न रहते...............

इंसान ही न रहते मोहब्बत के तलबगार ॥
सब जानवर परिंदे भी उल्फ़त के हैं शिकार ॥
ये इश्क़-प्रेम-आशिक़ी है सबकी हक़ीक़त ,
दुनिया के चलाने को ज़रुरी है जिस्मी-प्यार ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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