*मुक्त-मुक्तक : 102 - जो तेरा हुस्ने................


जो तेरा हुस्ने सरापा 
न आँखें खींच सका ॥
शरबते इश्क़ उसका 
ख़ुश्क दिल न सींच सका ॥
तो ख़ता इसमें तेरी क्या 
जो वो कमबख़्त तुझे ,
सख़्त तनहाई-ओ-ख़िल्वत में भी 
न भींच सका ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Brijesh Singh said…
वाह क्या बात है! बहुत खूब!

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