*मुक्त-मुक्तक : 101 - बेशुमार और..............



बेशुमार और बेहिसाब यों सितम झेले ॥
अब किसी ग़म का ग़म नहीं कि कितने ग़म झेले ॥
दूसरों को जो देखता हूँ सिसकते रोते ,
सोचता हूँ कि मैंने उनसे बहुत कम झेले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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