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Showing posts from March, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 134 - उसके दर्दे दिल...............

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उसके दर्दे दिल जिगर की मैं दवा बनकर रहूँ ॥ गर्मियों की लू लपट में सर्द हवा बनकर रहूँ ॥ यों मुझे देता है वो बस दर्दो ग़म रंजो अलम , वो मेरा है इसलिए उसका मज़ा बनकर रहूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 133 - मैं कब दीद के क़ाबिल

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मैं कब दीद के क़ाबिल फ़िर भी तकते मुझे रहो ! क्यों करते हो मुझसे इतना ज़्यादा प्यार कहो ? मेरे रूप रंग पर भूले पड़ती अगर नज़र , दुनिया करती है छिः छिः तुम वा वा अहो अहो ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 132 - भूखे के आगे मत.............

भूखे के आगे मत उड़ा 
बू–ए-क़बाब को ॥ मैकश हूँ मेरे सामने 
मत ला शराब को ॥ मत इम्तहान ले मेरे 
सब्रो करार का , वीराँ में रख छुपा 
नक़ाब में शबाब को ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 131 - भूख जिसकी भी...............

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भूख जिसकी भी लगे उसको मैं खाकर के रहूँ ॥ चाहता हूँ जो उसे हर हाल पाकर के रहूँ ॥ अब इसे ज़िद कहिए,कहिए ख़ब्त या मंज़िल की धुन, पाँव कट जाएँ तो सिर को मैं चलाकर के रहूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 4 - दिल की दिल में.......................

दिल की दिल में न रख ज़ुबाँ पर लाइए ॥ प्यार करते हों तो प्यार जतलाइए ॥ दिल की दिल................................ चोरी चोरी उन्हें कब तलक देखिए , हाले दिल की ख़बर ख़त में लिख भेजिए , यूँ न शर्माइए , यूँ न घबराइए ॥ प्यार करते हों तो प्यार जतलाइए ॥ प्यार ख़ुशबू है वो जो कि छिपता नहीं , जाने क्या बात है उनको दिखता नहीं , जाइए जाइए उनको दिखलाइए ॥ प्यार करते हों तो प्यार जतलाइए ॥ दिल से दिल को सुना राह होती यहाँ , अब जमाने मगर रह गए वो कहाँ , बात दिल आँख की उनको समझाइए ॥ प्यार करते हों तो प्यार जतलाइए ॥ वक़्त ऐसा न हो बीत जाए ये कल , फ़िर कभी ज़िंदगी में न आए ये पल , वक़्त पर उनके दिल में उतर जाइए ॥ प्यार करते हों तो प्यार जतलाइए ॥ दिल की दिल................................ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

गीत : 3 - इश्क़ करता हूँ.....................

इश्क़ करता हूँ मैं , प्यार करता हूँ मैं ॥ उनसे कैसे कहूँ उनपे मरता हूँ मैं ? इश्क़ करता...................................... खिलते चेहरे से कुछ भी पता न चले , दर्दे दिल कोई कैसे मेरा जानले ? अपने यारों से भी कुछ न कहता हूँ मैं ॥ उनसे कैसे कहूँ उनपे मरता हूँ मैं ? मेरी तन्हाइयों में गुजर देखिये , इश्क़ का मुझपे तारी असर देखिये , आतिशे हिज़्र में धू धू जलता हूँ मैं ॥   उनसे कैसे कहूँ उनपे मरता हूँ मैं ? मेरे दिल की उन्हें कैसे होगी ख़बर , मेरा क़ासिद यहाँ कोई होता अगर , प्यार की चिट्ठियाँ रोज़ लिखता हूँ मैं ॥ उनसे कैसे कहूँ उनपे मरता हूँ मैं ? इश्क़ करता हूँ मैं , प्यार करता हूँ मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

80 : ग़ज़ल - वहाँ के धुप्प अँधेरों में

वहाँ के धुप्प अँधेरों में , भी बिजली सा उजाला है ।।
यहाँ सूरज चमकते हैं , मगर हर सिम्त काला है ।।1।।
जो पाले हैं चनों ने वो , हिरन ,खरगोश ,घोड़े हैं ,
ये कछुए , केंचुए हैं जिनको बादामों ने पाला है ।।2।।
यहाँ हर एक औरत सिर्फ़ औरत है जनाना है ,
वहाँ दादी है ,चाची है ; कोई अम्मा है, ख़ाला है ।।3।।
वहाँ स्कूल ,कॉलिज ,अस्पताल और धर्मशाले हैं ,
यहाँ पग-पग पे मस्जिद ,चर्च, गुरुद्वारा, शिवाला है ।।4।।
वहाँ हर हाल में हर काम होता वक़्त पर पूरा ,
यहाँ सबने सभी का काम कल परसों पे टाला है ।।5।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

प्रतीक्षा गीत : 2 - कभी डाकिया...................

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कभी डाकिया जो मेरी  बनकर हवा चले ॥ तभी हाले दिल मेरा भी उनको पता चले ॥ कभी डाकिया..................................... उनकी निगाह में यों देखा है सब मगर , मेरा ही ख़्वाब अब तक आया नहीं नज़र , कब आएगा वो जाने मेरी नज़र तले ॥ कभी डाकिया..................................... तभी हाले दिल मेरा भी उनको पता चले ॥ मेरे ही आग अकेले दिल में लगी यहाँ , आँच अब तलक तो इसकी पहुँची नहीं वहाँ , मुझे इंतज़ार है कब वाँ पे शमा जले ॥ कभी डाकिया..................................... तभी हाले दिल उन्हें भी मेरा पता चले ॥ मशरूफ़ियत में सब के जैसे बिताऊँ मैं , फ़ुरसत के पल मगर ये कैसे बिताऊँ मैं , दिन गर गुज़ार लूँ पर फिर शाम ना ढले ॥ कभी डाकिया..................................... तभी हाले दिल मेरा भी उनको पता चले ॥ घुटता रहूँ मैं यूँ ही दिल की नक़ाब में , ऐसा न हो कहीं बस ख़्वाबों ही ख़्वाब में ,

प्रतीक्षा गीत : 1 - तुम मुझे मत.................

तुम मुझे मत डराओ , ये मुमकिन नहीं ; कि डरकर मैं ये रहगुज़र छोड़ दूँ ॥ जब ये पग जानकर ही उठे इस तरफ़ कैसे मंज़िल को पाये बिगर मोड़ दूँ ? इश्क़ की सब बलाओं से वाक़िफ़ हूँ मैं , क्या सितम है जफ़ा क्या है मालूम है , मुझको कोई नसीहत नहीं चाहिए , प्यार क्या है वफ़ा क्या है मालूम है , उनकी फ़ितरत सही बेवफ़ाई मगर मैं वफ़ाओं की क्योंकर क़दर छोड़ दूँ ? जब ये पग जानकर ही उठे इस तरफ़ कैसे मंज़िल को पाये बिगर मोड़ दूँ ? संगदिल हों कि हों दरियादिल वो सनम , मुझको उनकी तबीअत से क्या वास्ता ? मेरी उल्फ़त की तासीर की रंगतें उनको दिखलाएंगीं फ़िर मेरा रास्ता , मुझको तज्वीज़ ये टुक गवारा नहीं ; मैं कहीं और दीगर जिगर जोड़ दूँ ॥ जब ये पग जानकर ही उठे इस तरफ़ कैसे मंज़िल को पाये बिगर मोड़ दूँ ? इश्क़ के मैं हर इक इम्तिहाँ के लिए ख़ुद को बैठी हूँ तैयार करके यहाँ , ये अलग बात है बख़्त दे दे दग़ा ; अब भला ज़ोर क़िस्मत पे चलता कहाँ ? दिल शिकस्ता जो भूले न भूलूँ उन्हें ; बेबसी में हो सकता है दम तोड़ दूँ ॥ जब ये पग जानकर ही उठे इस तरफ़ कैसे मंज़िल को पाये बिगर मोड़ दूँ ? तुम मुझे मत डराओ , ये मुमकिन नहीं ; कि डरकर मैं ये रहगुज़र…

79 : ग़ज़ल - पूरा औरों पर ही

पूरा औरों पर ही मुन्हसिर ,जीते रहने में भला है क्या ?  जब होना ही ठीक ना हमें , आख़िर पीने से दवा है क्या ? दिल का आलम सख़्त दर्द का , मस्ती के गाने बजाओ मत ,
सुन-सुनकर तो और भी बढ़े ,ग़म ऐसे में कम हुआ है क्या ?
सालों बीते ठीक उस तरह , का कोई इंसान दूसरा ,
बाद उसके तस्वीर के सिवा , दुनिया में फिर मिल सका है क्या ? भलमनसत में साहुकार भी , दे देगा कुछ क़र्ज़ सूद बिन ,
पर पूछेगा पास आपके , रखने कुछ गिरवी रखा है क्या ?
अब आए हो आए क्यों न तुम , जब सब कुछ था हाथ में मेरे ,
फिर भी माँगो वैसे पास में , तुमको देने अब बचा है क्या ?
बतला तो क्योंकर हुआ है लू , के जैसा बादे सबा से तू ,
लेकिन ज्यों मैं खाक हूँ हुआ , तेरा भी यों दिल जला है क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

78 : ग़ज़ल - सफ़ेदी को कौओं में

सफ़ेदी को कौओं में क्यों ढूँढता है ? तू पागल नहीं है तो फिर और क्या है ? है तूफ़ान भी , आँँधियाँ भी लचक जा , तू क्यों टूट जाने उखड़ने खड़ा है ? तू पथराई आँखों में क्या झाँकता है , तेरा ख़्वाब तब भी था अब भी बसा है ॥ ये सब ऐशोआराम का साज़ोसामाँ , तुझे खो के लगता है बेकार का है ॥ तू फ़िर ज़ोर कितना ही अपना लगा ले , न नज़रों में गिर कर कोई उठ सका है ॥ हाँ करना ही होगा इलाज अब तो ‘हीरा’ कि अब सर से पानी गुजरने लगा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

77 : ग़ज़ल - सावधान होली के रंग में

सावधान होली के रंग में ,  भंग ना मिला जाए कोई रे ।। रंग से जो चिढ़ते हैं उनको ही ,  रंग ना लगा जाए कोई रे ।। जिसको रंग ना भाए उसको सच ,  भूल मत कभी रंग घोलिए, ये न हो कि भर क्रोध में किसी ,  का लहू बहा जाए कोई रे ।। आजकल तो होली की आड़ में ,  लोग बाग बदले निकालते , खेलना तो पर देखभाल कर ,  बैर ना निभा जाए कोई रे ।। घर से सर पे सौगंध चल उठा ,  कोई लाख तुझको दुहाई दे , भावना में भर और कर विवश ,  भंग ना पिला जाए कोई रे ।। वय ये तेरी सुन रख रही है डग ,  देहरी पे जोबन की तो है डर , होरिहा न होली की ओट में ,  वक्ष से सटा जाए कोई रे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

75 : ग़ज़ल - अपना काम तो था

अपना काम तो था समझाना ; क्या करते माना न ज़माना ?1।। कुछ ने माना झूठ ज़रूरी , बहुतों ने सच नाहक जाना ।।2।। महलों का होकर कारीगर , ढूँढूँ ख़ुद को एक ठिकाना !!3!! बस माँ ही अपने हिस्से का , बच्चों को दे सकती खाना ।।4।। बेमतलब महबूब का आना , आते ही जो रटता जाना ।।5।। धाक जमाने भर को घर में , ग़ैर ज़रूरी कुछ मत लाना ।।6।।
जान सके पढ़-पढ़ न कभी हम ,
इश्क़ में पड़कर इश्क़ को जाना ।।7।।
भीख मँगा मत पेट को पालो ,
इससे अच्छा ज़ह्र है खाना ।।8।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

74 : ग़ज़ल - है राह उजाले की

है राह उजाले की क्या इसके सिवा कोई ? मत कोस अँधेरे को जला ले दिया कोई ॥ मंज़िल की तरफ़ पूरी लगन से तू चल चला , इकलव्य का होता न कहीं रहनुमा कोई ॥ ख़ुश रह के ही हो सकती है बस ज़िंदगी दराज़ , रो-रो के न दुनिया में ज़ियादा जिया कोई ॥ हर फर्ज़ निभा क़र्ज़ चुका फ़िर जहाँ से उठ , लौटे न जो इक बार यहाँ से गया कोई ॥ माना कि ग़रीबों को भी मिलते दफ़ीने सच , होता न मगर रोज़ यही वाक़या कोई ॥ तुझको भी मोहब्बत का जो लग रोग है गया , तो उम्र की है ये नहीं तेरी ख़ता कोई ॥ राहों पे मुनासिब है कि आराम मत करो , मंज़िल पे मगर आ के भी चलता भला कोई ? लंबी सी ख़तरनाक सी सुनसान सच की इक , चल के दो क़दम राह से वापस चला कोई ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक :130 - गिरा नज़रों से भी............

गिरा नज़रों से भी हूँ 
और दिल का भी निकाला हूँ ॥ यक़ीनन हूँ बुझा सूरज
 पिघलता बर्फ काला हूँ ॥ समझते हैं जो ऐसा आज 
वो कल जान जाएँगे , मैं तल का मैक़दा हूँ 
या हिमालय का शिवाला हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक - 129 - तुमको शायद लगे............

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तुमको शायद लगे अजीब या थोड़ा गंदा ॥ हमने सोचा है अपना एक अलग ही धंधा ॥ राह लेकिन न किसी को गलत बताएँगे ॥ सबको उँगली पकड़ ठिकाने हम लगायेंगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 128 - यकीनन लाख झूठा..........

यक़ीनन लाख झूठा हो 
मगर सच्चा ही लगता है ॥ बड़ा हो जाये बेटा 
बाप को बच्चा ही लगता है ॥ किसी से भूलकर 
कर मत बुराई उसके बच्चे की , किसी का भी हो बच्चा 
उसको वो अच्छा ही लगता है । -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 127 - जो कुछ भी था...........

जो कुछ भी था सब तेरी वजह 
दस्तयाब था ॥ नाकाम रह के भी मैं सबसे 
कामयाब था ॥ तू मेरा क्या दुश्मन हुआ 
मैं ख़ुद हुआ प्यासा , जो दूसरों की तिश्नगी को 
शीरीं आब था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक :126 - जिससे होता था..............

जिससे होता रहा मैं पार
 वो कश्ती न रही ॥ जिसमें रहता था मैं महफ़ूज़ 
वो बस्ती न रही ॥ आम इंसाँ हूँ न जी पाऊँ
 न मर भी मैं सकूँ , हो गया जह्र भी महँगा 
दवा सस्ती न रही ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

73 : ग़ज़ल - रो-रो के अपने ग़म को

रो रो के अपने ग़म को सुनाने से फ़ायदा ?
हँसते हुओं को क्या है रुलाने से फ़ायदा ? जिसमें न तारा चाँद न सूरज रहा कोई , मंजर उस आँख को क्या दिखाने से फ़ायदा ? आराम का है काम औ' फिर वक़्त भी बहुत , फिर जल्दी , हाय-तौबा मचाने से फ़ायदा ? हो जाए बिगड़ा कुछ जो मरम्मत से गर नया , फिर दूसरा ख़रीद के लाने से फ़ायदा ? तेरे लिए ही तो वहाँ ताला पड़ा हुआ , उस दर पे घंटियों को बजाने से फ़ायदा ? दो चार दिन में तय है अगर मर ही जाऊँगा ,
चारागरों को घर पे बुलाने से फ़ायदा ? कॉलेज , अस्पताल , सरायें हैं लाज़मी , मंदिर क़दम क़दम पे बनाने से फ़ायदा ? नुक़्साँ को ही तुम अपने अगर समझो फ़ायदा , फिर फ़ायदे की बात बताने से फ़ायदा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति