*मुक्त-मुक्तक : 27 - कितना कितना गिरा.......


कितना -कितना गिरा पड़ा 
इक ज़रा -ज़रा सा उठने को ॥ 
बनने के इस फेर में तत्पर 
रहा सदा मैं मिटने को ॥ 
निःसन्देह सफलताओं का भी
 आलिंगन ख़ूब  किया ,
किन्तु  अभी तक मिला न मुझको 
सुख से तनिक लिपटने को ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे