Friday, February 8, 2013

36. ग़ज़ल : मेह्रबानी भी मुझे



मेह्रबानी भी मुझे उसकी क़हर लगती है ।। 
यूँँ पिलाती है दवा वो कि ज़हर लगती है ।।1।।
सींचती है वो इस अंदाज़ से सच तुलसी भी ,
पूरे सौ साल का पीपल का शजर लगती है ।।2।।
दिल्ली , कलकत्ता भी ,मुम्बई भी उसे गाँव लगे ,
हमको इक अद्ना सी बस्ती भी शहर लगती है ।।3।।
सुब्ह सा है न मिजाज़ उसका है शामों जैसा ,
रात आधी वो या फिर भर दुपहर लगती है ।।4।।
वो मँगाकर ही पहनती है मँगाकर खाती ,
शक्लो सूरत से रईसाना मगर लगती है ।।5।।
चाँद का लगती है टुकड़ा वो हमेशा लेकिन ,
जब वो सजती है सँवरती हैं क़मर लगती है ।।6।।
(क़मर = चाँद )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

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