36. मुक्त-ग़ज़ल : उनकी तो मेहरबानियाँ......................



उनकी तो मेहरबानियाँ भी क़हर लगती हैं II  
यूं  पिलाती  हैं  दवाएँ  कि  ज़हर लगती हैं II
सींचती हैं कुछ इस तरह से अपनी बगिया वो ,
तुलसियाँ  नीम के, बरगद के शज़र लगती हैं II
दिल्ली कलकत्ता मुम्बई भी उनको गाँव लगें ,
हमको अदना सी बस्तियाँ भी शहर लगती हैं II
न सुबह सा है न उनका है शाम जैसा मिजाज़ ,
वो देर रात या फिर भर दोपहर लगती हैं II
माँगकर खाती हैं वो माँगकर पहनती हैं ,
शक्लो सूरत से मालदार मगर लगती हैं II
यूं हमेशा ही वो लगती हैं चाँद का टुकड़ा ,
जब वो सजती हैं सँवरती हैं क़मर लगती हैं II 
(क़मर =चाँद )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक