Monday, February 11, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 42 - शबनम चाट-चाट के................




शबनम चाट-चाट के अपनी प्यास बुझाता हूँ ॥
तेज़ धूप में अपनी रोटी दाल पकाता हूँ ॥
ऊँट के मुंह में जीरे जितनी अल्प कमाई में ,
ज़िंदा रहने की कोशिश में मर-मर जाता हूँ ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...