34. मुक्त-ग़ज़ल : दो वक़्त रोटियों का...............


दो वक़्त रोटियों का अगर इंतज़ाम होता।। 
भूखों में ही सही पर कहीं एहतिराम होता।।

बर्दाश्त जो न होती मुझमें वो प्यास होती ,
हाथों में इक मेरे भी लबरेज़ जाम होता।।

 साजिश न थी ज़रूरी मुझे मारने की मुझसे ,

तेरा हँस के 'जान दे दो ' कहना तमाम होता।।

 संजीदगी से अपने फ़न को अगर मैं लेता ,

दुनिया में आज मेरा हर सिम्त नाम होता।।

मुझसे निक़ाह पढ़ने महबूबा मान जाती ,
होता किसी का नौकर ग़र काम धाम होता।।

क्या आदमी नहीं वो होता जो यार मेरे ,
होता किसी का ख़ादिम या फ़िर ग़ुलाम होता।।

    -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Brijesh Singh said…
बहुत सुन्दर!
http://voice-brijesh.blogspot.com
धन्यवाद !सिंह साहब ।
Anonymous said…
BAHUT SUNDAR SIR DIL KHUSH HO GYA
धन्यवाद ! जी !

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा