Saturday, February 2, 2013

25. ग़ज़ल : वो जवाहर वो सीमोज़र


वो जवाहर , वो सीमोज़र , वो पाक लगते हैं ।।
उनके हम आगे लोह , संग , ख़ाक लगते हैं ।। 
वो अमलतास , अशोक , देवदार वो पीपल ,
हम तो महुआ बबूल बेर ढाक लगते  हैं ।।
वो बहुत रोबदार , ख़ूब-ख़ास दिखने में ,
हम न तो बाअसर , न ठीक-ठाक लगते हैं ।।
वो महकते हुए गुलाबी , संदली पौडर ,
हम सड़क-धूल , बाजरे की राख लगते हैं ।।
गिन्नी-दीनार वो लिरा , वो पौण्ड-डॉलर भी ,
हम तो कौड़ी की एक फूटी आँख लगते हैं ।।
हम नहीं एक टन से एक रत्ती कम लेकिन ,
उनके बरअक्स सच किलो-छटाँक लगते हैं ।।
बस समझते हैं वो ही हमको पोला सरकण्डा ,
 बाक़ी दुनिया को हम भरी सलाख लगते हैं ।।
कृष्ण छिगुनी पे ही उठाएँ पूरा गोवर्धन , 
राम के आगे क्या कहीं पिनाक लगते हैं ?
इतना उजला है उनका रंग इतना उजला है ,
हंस , बगुले भी उनके आगे काक लगते हैं ।।
जितने लगते हसीन , भोले वो ख़ुशी के दम ,
उससे ख़फ़गी में उतने खौफ़नाक लगते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

        

4 comments:

Anonymous said...

bahot shandar hai hiralal ji.

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

मेरा अव्यक्त --राम किशोर उपाध्याय said...

बहुत सुन्दर लिखा है, बधाई

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! राम किशोर उपाध्याय जी !

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