25. मुक्त-ग़ज़ल : वो सीमोज़र वो


वो सीमोज़र वो जवाहर वो पाक लगते हैं ।।
हम उनके आगे लोह संग ख़ाक लगते हैं ।। 
वो अमलतास वो कचनार वो बरगद पीपल ,
हम तो महुआबबूलबेरढाक लगते  हैं ।।
वो बहुत बढ़ियाबहुत अच्छेबहुत  ख़ास दिखें ,
हम बुरे तो नहीं बस ठीक-ठाक लगते हैं ।।
वो महकते हुए संदल गुलाब के पौडर ,
हम उड़ती धूल औ'' कंडे की राख लगते हैं ।।
वो लिरा-पौंड वो दीनार वो डॉलर गिन्नी ,
हम तो फूटी हुई कौड़ी की आँख लगते हैं ।।
हम नहीं एक टन से एक मासा कम लेकिन ,
उनके  आगे तो तोला या छटाँक लगते हैं ।।
इक वही हमको समझते हैं पोला सरकंडा ,
बाक़ी दुनिया को भरी हम सलाख लगते हैं ।।
कृष्ण छिगुनी पे उठा लेते हैं गोवर्धन को , 
राम के आगे कहाँ पर पिनाक लगते हैं ।।
इतना उजला है उनका रंग इतना उजला है ,
हंस बगुले भी उनके आगे काक लगते हैं ।।
जितने लगते हैं हसीं भोले ख़ुशी के दम में ,
उससे खफ़गी में बहुत खौफ़नाक लगते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

        

Comments

Anonymous said…
bahot shandar hai hiralal ji.
आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
धन्यवाद ! राम किशोर उपाध्याय जी !

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