21(B) : ग़ज़ल - उड़ा दे मुझको गोली से



उड़ा दे मुझको गोली से या चाकू घोंप ले मुझको ॥
किसी भी शर्त पर लेकिन तू ख़ुद को सौंप दे मुझको ॥ 
भटकता फिर रहा हूँ बीहड़ों में ज़िंदगानी के ,
न दे बेशक़ कोई मंज़िल दिखा दे रास्ते मुझको ॥ 
न कर तू याद रब दी सौं गिला कोई नहीं होगा ,
भुलाने की न कर कोशिश ख़ुदा के वास्ते मुझको ॥ 
न ऐसे खिलखिलाके मुझसे कर बातें तू लग लग के ,
 कहीं तुझसे न हो जाए ख़िरामा इश्क़ रे मुझको ॥ 
मेरी गज़ भर ज़ुबाँ है तुझको गर ऐसा लगे तो सुन ,
ग़ज़ल भी मैं कहूँ तो आगे बढ़कर टोक दे मुझको ॥
अगर चाहे मैं टुकड़े-टुकड़े से फिर एक हो जाऊँ ,
तो दे कुछ ताक़तें , कुछ हिम्मतें , कुछ हौसले मुझको ॥ 
मेरा आँगन सड़क-फ़ुटपाथ नीला आस्माँ छप्पर ,
तरस मत खा या कर ख़ैरात इक-दो झोपड़े मुझको ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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