42. मुक्त-ग़ज़ल : अब अपनी मोहब्बत का .............

अब अपनी मोहब्बत का बताएँ क्या फ़साना ॥ 
तन्हा ही गुज़ारा है जवानी का ज़माना ॥ 
मशहूर थे इक-तरफ़ा मोहब्बत के तब भी ग़म ,
क़िस्मत में मगर अपनी तो लिक्खे थे उठाना ॥ 
इस सारे  ज़माने में वही एक नहीं थे ,
चाहा न मगर दिल ने किसी और पे आना ॥ 
इस बार क्या उस बार क्या हर बार उसी से ,
खाये थे बहुत धोख़े ये दिल फिर भी न माना ॥ 
तोहमत न शम्आ  को दो जलाने की शरारों ,
क्या तुमको नहीं भाये है ख़ुद को ही जलाना ॥ 
मनमीत की चाहत तो अधूरी ही रह गयी ,
यूँ रोज़ ही कइयों से हुआ मिलाना ॥
क़ाबिल तो न थे प्यार जिसे करते थे उसके ,
पर ख़ुद को चकोरा ही उसे चाँद ही माना ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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