33. मुक्त-ग़ज़ल : आग यहाँ पर.........


आग यहाँ पर लगी हुई है जाकर दमकल ले आओ ॥ 
पानी वानी कुछ मत पूछो पूरी बोतल ले आओ ॥ 
 तेज़ रोशनी सहन नहीं है ये सूरज चंदा फेंको ,
रात अँधेरी लाओ मुझको तारे झलमल ले आओ ॥ 
 न सूती न खादी न  रेशम के ढेर लगाओ तुम ,
बस चाहे इक टुकड़ा ही ढाका कि मलमल ले आओ ॥ 
 ये नीला आकाश ये सूरज चाँद सितारे ढँक डालो ,
सूखा चारोँ ओर पड़ा है काले बदल ले आओ ॥ 
 चीख़-चीख़ ख़ामोशी इस गुलशन की बोले जा इसमें ,
चिड़िया;तोता;मैना;बुलबुल;कोयल ;गलगल ले आओ ॥ 
 एक जगह पर ठहरे पानी जैसा जीवन मत रोको ,
निकलो कूप ताल से नदियों जैसी हलचल ले आओ ॥ 
 एक शर्त पर तुमको दिल से मैं कर दूँगा माफ़ मगर ,
मुझसे छीने हुए सुहाने इक या दो पल ले आओ ॥ 
 लूट लिया जब सब मरीज़ का डाक्टरों ने अर्ज़ किया ,
जो पहले ही कह देना था 'बस गंगा जल ले आओ' ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आ. डॉ. मोनिका शर्मा जी बहुत बहुत धन्यवाद !
Anonymous said…
Ohho very Niceeeeeee....sir g
shailendra dubey said…
Ohho very Niceeeeeee sir g
बहुत बहुत धन्यवाद ! shailendra dubey जी !

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