40. ग़ज़ल : दिन से काली रात



दिन से काली रात होता जा रहा हूँ ।। 
जीत  से  मैं  मात होता जा रहा हूँ ।।1।।

जिनके साए से भी बचना है उन्हींं के ,
हर घड़ी बस साथ होता जा रहा हूँ ।।2।।

जिनकी उँगली भी न था कल आज उनका ,
सीधे दाँया हाथ होता जा रहा हूँ ।।3।।

हुस्न के इक रेग्ज़िस्ताँ पे मैं बदरू ,
धूप में बरसात होता जा रहा हूँ ।।4।।
उनका दूल्हा बन न पाया हूँ लिहाज़ा ,
उनकी अब बारात होता जा रहा हूँ ।।5।।

जो समझता ही नहीं शीरीं ज़ुबाँ को ,
भूत को , इक लात होता जा रहा हूँ ।।6।।
गहरी ख़ामोशी उदासी को फिसल-गिर ,

इक हँसी की बात होता जा रहा हूँ ।।7।।

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Unknown said…
बहुत सुन्दर!
बहुत खूब!
http://voice-brijesh.blogspot.com/
Anonymous said…
बहुत सुन्दर
धन्यवाद ! mohit punpher जी !

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