40. मुक्त-ग़ज़ल : दिन से काली रात...................


दिन से काली रात होता जा रहा हूँ।। 

जीत  से  मैं  मात होता जा रहा हूँ।।

जिनके साए से भी बचना है उन्ही के ,

हर घड़ी बस साथ होता जा रहा हूँ।।

जिनकी उँगली भी न था कल आज उनका ,

सीधे दाँया हाथ होता जा रहा हूँ।।

हुस्न के इक रेग्ज़िस्ताँ पे मैं बदरू ,

धूप में बरसात होता जा रहा हूँ।।

 उनका दूल्हा बन न पाया हूँ लिहाजा ,

उनकी अब बारात होता जा रहा हूँ।।

जो समझता ही नहीं शीरीं जुबाँ को ,

भूत को इक लात होता जा रहा हूँ।।

 गहरी ख़ामोशी उदासी को फिसलकर ,

इक हँसी की बात होता जा रहा हूँ।।

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Brijesh Singh said…
बहुत सुन्दर!
बहुत खूब!
http://voice-brijesh.blogspot.com/
धन्यवाद ! Brijesh Singh जी !
Anonymous said…
बहुत सुन्दर
धन्यवाद ! mohit punpher जी !

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