28. मुक्त-ग़ज़ल : सर को उठा............


सर को उठा न ऐसे नुमूदार होइए ।।
करके गुनाह कुछ तो शर्मसार होइए ।।
बेकार सी न बनके क़ब्र घेरिये जगह ,
होना  है तो फिर ताज सी मजार होइए ।।
हालात ज़रुरत के मुताबिक़ कभी-कभी ,
रखकर कलम को जेब में तलवार होइए ।।
अड़ जाए एन वक़्त पे या फिर पटक ही दे ,
घोड़े पर इस तरह से मत सवार होइए ।।
दो के अगर न चार बनाने का हुनर हो ,
मरियेगा भूख से न कर्ज़दार होइए ।।
कब तक नदी के सूखने की राह तकेंगे,
न पुल न नाव तैरकर ही पार होइए 
 (नुमुदार=आविर्भूत/प्रकट/व्यक्त)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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