30. मुक्त-ग़ज़ल : बहरे को ज्यों..................


बहरे को ज्यों सितार की झंकार व्यर्थ है ।।
अंधे पिया के सामने श्रृंगार व्यर्थ है ।।
यौवन में ब्रह्मचर्य बड़ी बात है माना ,
शादी का ढलती उम्र में विचार व्यर्थ है ।।
जपता जो ब्रह्म सत्य,ब्रह्म सत्य की माला ,
उसके लिए घर बार क्या संसार व्यर्थ है ।।
जो पक चुका हो आँच में उस घट को गलाने,
पानी में डुबो रखना लगातार व्यर्थ है ।।
जब तक न पिटेगी रहेगी चुप्पचाप ही ,
ढोलक पे उँगलियों की फेर-फार व्यर्थ है ।।
औलाद के लिए या किसी भी लिहाज से ,
कुंती के साथ पान्डु का अभिसार व्यर्थ है ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anonymous said…
nice
धन्यवाद ! mohit punpher जी !

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