Sunday, February 3, 2013

कविता : सस्ता सौदा


बिलबिलाते हुए काले-सफ़ेद _

लिजलिजे-पिलपिले कीड़ोंसे ,
फोड़ा-फुंसी युक्त /
बिना बालों के /
घिनौनी चमड़ी वाले /
अपने ही मालिक द्वारा परित्यक्त कुत्ते से _
जिसे देखते ही मेरी उबकाई रुक नहीं पाती है /
अतिशय घृणा  है मुझे ,
डर लगता है मुझे 
उन भयंकर यातनाओं से 
जो मरणोपरांत 
रौरव और कुंभीपाक नर्क में /
पापी मनुष्यों को दी जाती हैं ,
क्योंकि मुझे पूर्व-जन्म और पुनर्जन्म में /
पूर्ण विश्वास है _
स्वर्ग-नर्क में भी _
अतः मेरे पुण्यों के बदले /
मरने के बाद मुझे स्वर्ग मत देना /
और अगले जन्म में /
ऐसा ही बिलबिलाता कोई गिजगिजा कीड़ा /
या खसर-खसर खुजलाता /
घिसटता तड़पता पागल कुत्ता बना देना /
किन्तु इससे पहले कि मेरी उम्र निकल जाये /
इस राकेट-चाल दुनिया में /
मुझे चाहिए _
भले ही छोटी सी किन्तु /
एक स्थायी /नियमित सरकारी नौकरी _
हे ईश्वर ! क्या मंजूर होगा तुझे यह सौदा ?
जवाब शीघ्र देना /
वर्षों से प्रतीक्षा में _
एक अस्थाई अनियमित दैनिक वेतन भोगी !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

2 comments:

Rekha Joshi said...

क्योंकि मुझे पूर्व-जन्म और पुनर्जन्म में /
पूर्ण विश्वास है _
स्वर्ग-नर्क में भी _
अतः मेरे पुण्यों के बदले /
मरने के बाद मुझे स्वर्ग मत देना /
और अगले जन्म में /,sundr bhaav

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

आ. रेखा जोशी जी बहुत बहुत धन्यवाद ।

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

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