39. मुक्त-ग़ज़ल : न कंस न लंकेश..................


न  कंस  न  लंकेश  से  बदनाम  मुफ़्त  में।। 
मिलते हैं यहाँ कृष्ण के सँग राम मुफ़्त में।।
दिल से करोगे काम तो पाओगे शर्तिया ,
मेहनत का सिला साथ में इनआम मुफ़्त में।।
हैं मातहत वो तेरे जो करते हैं बंदगी ,
वरना किसी को कौन दे सलाम मुफ़्त में।।
मुँह माँगी तनख़्वाह पे नौकर रखेगा कौन ?
मिलते सहूलियत से जब ग़ुलाम मुफ़्त में।।
वो चाहता है तुमको रिंद -पेशा बनाना ,
जो रोज़ पिलाता है मय के जाम मुफ़्त में।।
भरमार जब न थी तो बहुत ख़ास थे ये आम ,
बिकते थे फ्रिज के साथ कभी आम मुफ़्त में।। 
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति    



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