*मुक्त-मुक्तक : 19 - कंघी कर कर

कंघी कर कर ज़ुल्फों वाला गंजा हो बैठा ॥ 
तक तक चम चम आँखों वाला अंधा हो बैठा ॥ 
सूरज बनने की चाहत में खुद को आग लगा ,
बेचारा जुगनू बर्फ़ानी ठंडा हो बैठा ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 256 - मंज़िल

मुक्त-ग़ज़ल : 257 - मक़्बरा......

मुक्त ग़जल : 254 - चोरी चोरी