27. मुक्त-ग़ज़ल : पहले थे नर्मोनर्म...........


पहले थे नर्मोनर्म गुल अब केक्टस हुए ।।
आँखों का जो अंजन थे लाल मिर्च जस हुए ।।
पहले थे सुलभ सस्ते बीड़ी जर्दा तम्बाकु 
 अब कीमती सिगारो अफ़ीमो चरस हुए ।।
पहले थे उनके दूध में हम जाफ़रान से, 
आज इक क़रीह भिनभिनाती सी मगस हुए ।।
सब कुछ था हममें खूबसूरती के सिवाय ,
हम नींव में गड़े वो चमकते कलस हुए ।।
जब से मिली है उनको इक हसीं की मोहब्बत 
सूखे थे सुपाड़ी से वो गन्ना सरस हुए ।।
जीते जी पड़ोसी भी जिन्हें जान न सके ,
मरने के बाद उनके ज़माने में जस हुए ।।
करने को उनकी धूप को कुछ और चमकदार ,
पूनम के सब चराग़ अमा के तमस हुए ।।
चुभवा लीं सुइयाँ हँसके जगह से हिले बगैर 
इक गुदगुदी के नाम से झट टस  से मस हुए ।।
                         
(करीह=घिनौनी ,मगस =मक्खी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति


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