*मुक्त-मुक्तक : 22 - नर्म डंठल..............


नर्म डंठल की जगह सख़्त तना हो जाना ॥
बिखरे-बिखरे से चाहता था घना हो जाना ॥
कोशिशों में तो कसर कुछ न उठा रक्खी थी ,
पर था क़िस्मत में हर इक हाँ का मना हो जाना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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