*मुक्त-मुक्तक : 78 - कुछ को मैं ऊँची............


कुछ को मैं ऊँची अटारी पे 
खड़ा लगता हूँ ॥
कुछ को इस शहर के गटर में 
पड़ा लगता हूँ ॥
कुछ हरा, सघन, 
सायादार मुझे कहते हैं ,
कुछ को मैं सूखा, विरल, 
पत्रझड़ा लगता हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

वाह वाह , बहुत ही खूबसूरत , पूरी जिंदगी का फ़लसफ़ा कह डाला आपने तो अपने इस कतरे में :) सुदर ।
धन्यवाद ! अजय कुमार झा साहब !
SATYA NARAYAN said…
Very Nice Sir...............Jivan Esi Ka Nam Hai.........
Pratibha Verma said…
बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ...

आप भी पधारें
ये रिश्ते ...

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