Monday, February 18, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 59 - तेरे तेवर से.................


तेरे तेवर से 
बग़ावत की तेज़ बू आए ॥ 
मंद साँसों से भी 
नाराज़गी की लू आए ॥ 
कैसे मुमकिन है 
और साथ-साथ अपना सफ़र ,
न चले साथ 
न आगे न पीछे तू आए ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...