57 : मुक्त-ग़ज़ल - हर सिम्त जुल्मो.............



हर इक सिम्त ज़ुल्मो सितम हो रहा है ॥
जिसे देखो गरमा गरम हो रहा है ॥
ख़ुदा मानकर पूजता हूँ जिसे मैं ,
वो पत्थर न मुझ पर नरम हो रहा है ॥
शगल जिसका कल तक था मुझको हँसाना ,
अब उसके ही हाथों सितम हो रहा है ॥
बहुत ख़ुश था शादी के पहले जो मुझसे ,
वो नाराज़ हरदम सनम हो रहा है ॥
कमाते थे बाहर तरसते थे घर को ,
निठल्ले हैं घर पर तो ग़म हो रहा है ॥
जो है आजकल मुझसे बर्ताव उसका ,
वो अब भी है मेरा वहम हो रहा है ॥
यकीं था कि वो नाम रोशन करेगा ,
वो छुई मुई मगर बेशरम हो रहा है ॥
मेरी ज़िंदगी में असर उसका पूछो ,
था पहले बियर अब वो रम हो रहा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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