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Friday, February 22, 2013

54 : मुक्त-ग़ज़ल - बहुत चाहत है.......................


बहुत चाहत है कुछ बोलूँ मगर बस कहना मुश्किल है ॥
ज़ुबाँ खुलती नहीं और बिन कहे रहना भी मुश्किल है ॥
हैं माहिर लोग ग़ैरों को भी सब अपना बनाने में ,
यहाँ अपनों को भी अपना बनाए रखना मुश्किल है ॥
कहाँ होती हैं दुनिया में सभी की ख़्वाहिशें पूरी ,
अधूरे ख़्वाब लेकर ज़िंदगी जी सकना मुश्किल है ॥
न कर नाहक़ लतीफ़ागोई मैं ग़मगीन हूँ इतना ,
हँसी की बात पर भी आज मेरा हँसना मुश्किल है ॥
करो करते रहो मुझ पर जफ़ा जी भर इजाज़त है ,
सितम तो जब कोई अपना करे तब सहना मुश्किल है ॥
चपत दिखलाएगा दुश्मन तो मैं तो लात जड़ दूँगा ,
मेरा इस दौर में गाँधी सरीखा बनना मुश्किल है ॥
बहुत आसान है देना बहुत अच्छी सलाहें भी ,
मगर हालात के मारों का उन पर चलना मुश्किल है ॥
अगर जाना है रेगिस्तान फ़ौरन ऊँट बन जाओ ,
वहाँ मेंढक या मछली का क़दम भर चलना मुश्किल है ॥
( लतीफ़ागोई = चुटकुला सुनाना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

3 comments:

Umesh Chandra said...

apki her rachna dil ko cho jati hai..............yah rachna bhut hi pasnd aai....
.badhi

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Umesh Chandra जेआई !

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