53 : मुक्त-ग़ज़ल - मुद्दत से बंद...................



मुद्दत से बंद अपनी ज़बाँ खोल रहा हूँ ॥
हर लफ़्ज़ क़सम आपकी सच बोल रहा हूँ ॥
बहुतों के भले को मैं अपने जानी दोस्त की ,
माना दग़ा है फ़िर भी खोल पोल रहा हूँ ॥
मुझमें कोई कहाँ है लोग जान न सके ,
कंचे की तरह मैं हमेशा गोल रहा हूँ ॥
जिनकी निगह में आज न क़ीमत रही मेरी ,
उनके लिए मैं कल तलक अनमोल रहा हूँ ॥
इक रोज़ में तुम उसका राज़ लेने चले हो ,
मुद्दत से जिसे यार मैं टटोल रहा हूँ ॥
चाहत के मुताबिक़ न इसमें कोई डालता ,
मुफ़लिस का आधा खाली मैं कशकोल रहा हूँ ॥
वादा तेरी मदद का मैं भूला नहीं मगर ,
हालात कुछ ऐसे हैं कि अब डोल रहा हूँ ॥
लागत पे बेचकर भी मैं घाटे में कब रहा ,
हर चीज़ तराज़ू में कम ही तोल रहा हूँ ॥
( कशकोल=भिक्षा पात्र )
- डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Arpit Anaam said…
टटोल रहा हूँ
Pratibha Verma said…
मुझमें कोई कहाँ है लोग जान न सके ,
कंचे की तरह मैं हमेशा गोल रहा हूँ ॥

बहुत खूब ...

धन्यवाद ! Arpit Anaam जी !
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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