Friday, February 22, 2013

53 : ग़ज़ल - मुद्दत से बंद अपना मुँह




मुद्दत से बंद अपना , मुँह खोल मैं रहा हूँ ।।
हर लफ़्ज़ अब क़सम से , सच बोल मैं रहा हूँ ।।1।।
उनके भले की ख़ातिर , बेशक़ दग़ा है लेकिन ,
खोल अपने दोस्त की ही , अब पोल मैं रहा हूँ ।।2।।
मुझमें कोई कहाँ है , कब लोग जान पाए ?
कंचे सा जो हमेशा , ही गोल मैं रहा हूँ ।।3।।
जिनकी निगाह में अब , क़ीमत रही न अपनी ,
कल तक जहाँ में सबसे , अनमोल मैं रहा हूँ ।।4।।
इक रोज़ में तुम उसका , लेने को राज़ आए ,
जिसको न जाने कब से , नित टोल मैं रहा हूँ ।।5।।
चाहत के कुछ मुताबिक़ , इसमें न कोई डाले  ,
दरवेश का जो ख़ाली , कजकोल मैं रहा हूँ ।।6।।
वादा तेरी मदद का , भूला नहीं हूँ लेकिन ,
हालात हैं कुछ ऐसे , सो डोल मैं रहा हूँ ।।7।।
सस्ते में बेचकर भी , होता नहीं है नुक़्साँ ,
सौदा हर इक शुरू से , कम तोल मैं रहा हूँ ।।8।।
( टोल = टटोल , कजकोल=भिक्षा पात्र )
- डॉ. हीरालाल प्रजापति 

4 comments:

Arpit Anaam said...

टटोल रहा हूँ

Pratibha Verma said...

मुझमें कोई कहाँ है लोग जान न सके ,
कंचे की तरह मैं हमेशा गोल रहा हूँ ॥

बहुत खूब ...

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Arpit Anaam जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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