*मुक्त-मुक्तक : 53 - ये उथली मचलती...............



ये उथली मचलती मेरी डुबोने ताड़ सी हस्ती ॥ 
विकट तूफाँ उठाती है ये अदना नहर सी बस्ती ॥ 
उसे मालूम क्या मैंने भी अबके कस के ठानी है ,
लगाकर ही रहूँगा पार अपने इश्क़ की क़श्ती ॥ 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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