50 : मुक्त-ग़ज़ल - आ जाओ आ के मेरा..............


जाओ आके मेरा हुलिया बिगाड़ दो ना ॥ 
घटिया सी बिलबिलाती दुनिया उजाड़ दो ना ॥ 
मेरे गुनाहों पर मैं खुद माँगता सज़ा हूँ ,
फाँसी दो या ज़मीं में ज़िंदा ही गाड़ दो ना ॥ 
हर बात में तो आगे दुनिया निकल गई है ,
क्यों चल रहे हो पीछे तुम भी पछाड़ दो ना ॥ 
तुमने ही तो उढ़ाई है मुझपे चादरे ग़म ,
लो नब्ज़ भी चली अब अब तो उघाड़ दो ना ॥ 
भेजे हैं ख़त जो तुमको हर्फ़ हर्फ़ सच लिखा है ,
इक बार पढ़ लो चाहे फिर चीर-फाड़ दो ना ॥ 
फ़िर से न जोड़ पाऊँ कहीं और अपने दिल को ,
कुछ इस तरह से मुझको तुम तोड़-ताड़ दो ना ॥ 
आदी हैं हम तो कूड़े-कचरे में ही बसर के ,
तुमको बुरा लगे तो तुम्हीं पोंछ-झाड़ दो ना ॥ 
लग जाएँगे बुरे भी हम खुल के  काम करने ,
आती है शर्म पहले दिन कुछ तो आड़ दो ना ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...
बहुत बहुत धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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