49 : मुक्त-ग़ज़ल - नर्मों नाजुक गुलबदन................



नर्मों नाजुक गुलबदन उसका नुकीला हो गया ॥ 
फूल जैसा दिल यकायक ही कटीला हो गया ॥ 
पहले सुन लेता था हर इक बात हँसकर सिर झुका ,
अब तो अड़ जाता है जब तब यों हठीला हो गया ॥ 
चुस्त था ,था दुरुस्त भी बड़ा मस्त मौला आदमी ,
जाने किस उम्मीद को मौत आई ढीला हो गया ॥ 
वह गठीला गज बदन फ़िक्रे मआश की आग में ,
नौजवानी में ही दिन दिन पीला तीला हो गया ॥ 
आज तो बस डांट और फटकार पाई भीख में ,
अश्क़ बारी से बचा आटा भी गीला हो गया ॥ 
इक ख़ुदा की राह का नंगा अचानक क्या हुआ ,
बेश क़ीमत पैरहन धजकर छबीला हो गया ॥ 
मुफ़्त का माल अब हज़म करना उसे आने लगा ,
इकहरा उसका बदन दोहरा गठीला हो गया ॥ 
उनकी सेहत के लिए लाजिम था कोई मसखरा ,
उनके दिल बहलाव का मैं इक वसीला हो गया ॥ 
( फ़िक्रे मआश=रोज़ी-रोटी की चिंता ,पैरहन=वस्त्र ,वसीला=जरिया )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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