48 : ग़ज़ल - हो आग जाँ लगी वाँ


हो आग जाँ लगी वाँ , दमकल की अब पहुँच हो ॥ 
ठण्डी लहर चले जाँ , कंबल की अब पहुँच हो ॥ 
दर्या के कब किनारे , तालाब हों ज़रूरी ,
जिस घर नहीं कुआँ वाँ , इक नल की अब पहुँच हो ॥ 
कपड़े न हों , न हो छत , लेकिन ग़रीब तक बस ,
रोज़ाना दाल-रोटी , चावल की अब पहुँच हो ॥ 
जिनकी रपट भी कोई , लिखता नहीं ख़ुद उन तक ,
थाने , अदालतों की , दल-बल की अब पहुँच हो ॥ 
गुलशन में फूल तो हों , और संग तितलियों के ,
बुलबुल की , तोता , मैना , कोयल की अब पहुँच हो ॥ 
बदबू से साँस लेना , भी हो जहाँ पे मुश्किल ,
उस बस्ती में जलाने , गुग्गल की अब पहुँच हो ॥ 
हो इंतिज़ाम ऐसा , बच्चों तलक तो हरगिज़ ,
गुटखा , न बीड़ी और ना , बोतल की अब पहुँच हो ॥ 
या रब कमाल कर दे , ऐसा कि तपते प्यासे ,
मरुथल में रोज़ गंगा , से जल की अब पहुँच हो ॥ 
( गुग्गल = सुगंधित द्रव्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Unknown said…
bahut shandaar dil ko chooti kruti****badhaai shriman
बहुत बहुत धन्यवाद ! gope mishra जी !
shishirkumar srivastava. said…
'Itna amir mulk ko kade mere khuda'
Dhanyabad Dr sahab gajal bahut hasin hai.


Shishirkumar
धन्यवाद ! shishirkumar srivastava जी !
Unknown said…
वाह मित्र डा. हीरालाल जी.. बहुत खूब
Unknown said…
This comment has been removed by the author.

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