47 : मुक्त-ग़ज़ल - पहले दो इक छोड़..................


पहले दो इक छोड़ सभी सिंगार सजाकर निकले हैं ॥ 
आज नहाये नहीं इसलिए इत्र लगाकर निकले हैं ॥ 
जाने क्या लेकिन उनसे कुछ भूल हो गई है वरना ,
आँख दिखाने वाले कैसे आँख बचाकर निकले हैं ॥ 
उनके रँग-ढंग चालों को तुम ज़रा ग़ौर से देखो तो ,
आदमख़ोर भेड़िये गौ का खोल चढ़ाकर निकले हैं ॥ 
झूठ गवाहों के सबूत की सख़्त बिना पर मुंसिफ़ जी ,
बेगुनाह को हाय सज़ा-ए-मौत सुनाकर निकले हैं ॥ 
शान से महबूबा के घर से जिसको बेटी कहते थे ,
भेस मुज़र्रद का धर बाबा हवस मिटाकर निकले हैं ॥ 
जाओ जाकर देखो अपनी आग लगाने का मंजर ,
झुलस गए हैं उतने जितने लोग बुझाकर निकले हैं ॥ 
ये कालिख ये राख़ किसी घूड़े की समझ न ऐ ज़ालिम ,
तेरी ख़ातिर हम अपना घरबार जलाकर निकले हैं ॥
( मुंसिफ़=न्यायकर्ता , मुज़र्रद=ब्रह्मचारी ) 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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