Sunday, February 17, 2013

47 : ग़ज़ल - पहले दो इक छोड़ सभी


पहले दो इक छोड़ सभी सिंगार सजाकर निकले हैं वो ॥
आज नहाये थे जो नहीं सो इत्र लगाकर निकले हैं वो ॥
जाने क्या लेकिन उनने कुछ भूल यक़ीनन की है वर्ना ,
आँख दिखाने वाले कैसे आँख बचाकर निकले हैं वो ?
उनके रँग-ढँग चाल को तुम जो ग़ौर से देखो पहचानोगे ।।
नरभक्षी कुछ भेड़िये गौ का खोल चढ़ाकर निकले हैं वो ॥
झूठे गवाहों , फ़र्ज़ी सबूतों की ही बिना पर मासूमों को ,
आख़िर मुंसिफ़ आह ! सज़ा-ए-मौत सुनाकर निकले हैं वो ॥
तनहा इक मुँहबोली बहन के घर से मुजर्रद कहलाते जो ,
अक़्सर देखा और सुना भी रात बिताकर निकले हैं वो ॥
जाओ जाकर देखलो अपनी आग लगाने का मंज़र तुम ,
ख़ुद ही झुलसकर बैठे हैं जितने लोग बुझाकर निकले हैं वो ॥
इस कालिख इस राख़ को खंडर की न समझ लेना तू ज़ालिम ,
तेरी ख़ातिर अपना नया घरबार जलाकर निकले हैं वो ॥
( मुंसिफ़=न्यायकर्ता , मुज़र्रद=ब्रह्मचारी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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