44 : ग़ज़ल - पूरा पूरा उजड़ गया हूँ


पूरा पूरा उजड़ गया हूँ ॥
जबसे तुझसे बिछड़ गया हूँ ॥
बरगद सा मैं जमा हुआ था ,
नीलगिरी सा उखड़ गया हूँ ॥
अब न रफ़ूगर मुझे समझना ,
मैं ही सिरे से उधड़ गया हूँ ॥
तेरी ख़ातिर था रहनुमा मैं ,
तुझ बिन सबसे पिछड़ गया हूँ ॥
अब मस्जिद की जगह मैं रस्ता ,
मैख़ाने का पकड़ गया हूँ ॥
क़ाबू में था , था जब तू निगराँ ,
खुल्लम-खुल्ला बिगड़ गया हूँ ॥
दर्या होना था ग़ैर मुमकिन ,
पोखर बनकर मैं सड़ गया हूँ ॥
( रहनुमा =पथप्रदर्शक ,निगराँ =देखरेख रखने वाला )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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