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Showing posts from February, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 80 - बचपन में ही.................

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बचपन में ही युवायी प्रेम सिक्त हैं बच्चे ! ये किस तरह की गुफ़्तगू में लिप्त हैं बच्चे ? क्यों इस तरह के वाक़यात पेश आ रहे ? क्या बाप माँ के प्यार से अतृप्त हैं बच्चे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक :79 - उम्र भर इश्क़................

उम्र भर इश्क़ लगा 
सख़्त नागवार मुझे ॥ क़ौमे आशिक़ से ही 
जैसे थी कोई खार मुझे ॥ कितना अहमक़ हूँ 
या बदक़िस्मती है ये मेरी , वक़्ते रुख़सत हुआ है 
इक हसीं से प्यार मुझे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

57 : ग़ज़ल - हर सिम्त जुल्मो

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हर इक सिम्त ज़ुल्मो सितम हो रहा है ॥ जिसे देखो गरमा गरम हो रहा है ॥ ख़ुदा मानकर पूजता हूँ जिसे मैं , वो पत्थर न मुझ पर नरम हो रहा है ॥ शगल जिसका कल तक था मुझको हँसाना , अब उसके ही हाथों सितम हो रहा है ॥ बहुत ख़ुश था शादी के पहले जो मुझसे , वो नाराज़ हरदम सनम हो रहा है ॥ कमाते थे बाहर तरसते थे घर को , निठल्ले हैं घर पर तो ग़म हो रहा है ॥ जो है आजकल मुझसे बर्ताव उसका , वो अब भी है मेरा वहम हो रहा है ॥ यकीं था कि वो नाम रोशन करेगा , वो छूई-मुई बेशरम हो रहा है ॥ मेरी ज़िंदगी में असर उसका पूछो , था पहले बियर अब वो रम हो रहा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 78 - कुछ को मैं ऊँची............

कुछ को मैं ऊँची अटारी पे 
खड़ा लगता हूँ ॥ कुछ को इस शहर के गटर में 
पड़ा लगता हूँ ॥ कुछ हरा, सघन,
सायादार मुझे कहते हैं , कुछ को मैं सूखा, विरल,
पत्रझड़ा लगता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 77 - फ़कीरी में जो.............

फ़कीरी में जो ख़ुश मत उसको धन-दौलत अता करना ॥ मोहब्बत के तलबगारों को मत नफ़रत अता करना ॥ ख़ुदा क्या किसको लाजिम है बख़ूबी जानता है तू , लिहाज़ा माँगने की मत मुझे नौबत अता करना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कविता :देखकर तुझको मेरे..........

देखकर तुझको मेरे दिल में ख़याल आए यही / तू है जितनी खूबसूरत स्वर्ग में भी तो नहीं / कृष्ण तझको देख लें तो भूल जाएँ राधिका / इन्द्र तुझसे ब्याह की करने लगेंगे याचना / सोचता हूँ देखता हूँ जब तेरे मुखड़े की ओर / चाँद को कितना भी चाहे पर न पाएगा चकोर / क्यों दिखाकर अपना जलवा लूटती फिरती हो दिल / ढाँक कर चेहरा ही रक्खो तो भी हों कुछ कम क़तल / तू अगर है अप्सरा तो क्यों धरा पर आई है / आस्माँ की तू परी है क्यों उतर कर आई है / मुझ सरीखा तो तेरे चरणों की चाटे धूल को / देवता होगा जो चूमेगा तेरे मुख फूल को /

*मुक्त-मुक्तक : 76 - दिन रात ख़्यालों..........

दिन रात ख़यालों में 
सफर ठीक नहीं है ॥ हर वक्त उदासी का 
जहर ठीक नहीं है ॥
कह दो उसे जो दिल में है 
दुनिया जहान से,
घुट घुट के ज़िंदगी का 
बसर ठीक नहीं है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

56 : ग़ज़ल - मुझको जीने की

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मुझको जीने की मत दुआ दो तुम ॥ हो सके दर्द की दवा दो तुम ॥ क्यों हुआ ज़ुर्म मुझसे मत सोचो , जो मुक़र्रर है वो सज़ा दो तुम ॥ मुझको हमदर्द मानते हो तो , अपने सर की हर इक बला दो तुम ॥ मैं तो तुमको बुला-बुला हारा , कम से कम अब तो इक सदा दो तुम ॥ यूँ न फूँको कि बस धुआँ निकले , ख़ाक कर दो या फिर बुझा दो तुम ॥ रखना क़ुर्बाँ वतन पे धन दौलत , गर ज़रूरत हो सर कटा दो तुम ॥ वो जो इंसाँँ बनाते हैं उनको , कुछ तो इंसानियत सिखा दो तुम ॥ फँस गया हूँ मैं जानते हो गर , बच निकलने की रह बता दो तुम ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 75 - जिसको बूंद न..............

जिसको बूंद न लाजिम 
उसको सरिता लिखता है ॥

गद्य न जाने उसको भी 
फिर कविता लिखता है ॥
भाग्य विधाता जब अपनी 
मस्ती में होता है,
ब्रह्मचारियों को 
पग पग पर वनिता लिखता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 74 - जहां रोना फफक.............

जहाँ रोना फफक कर होवहाँ दोअश्क़टपकाऊँ ॥
ठहाका मारने के बदलेबस डेढ़ इंच मुस्काऊँ ॥
दिमागो दिल पे तारी हैकिफ़ायत का जुनून इतना ,
जो कम सुनते हैं उनसे भीमैं धीमे धीमे बतियाऊँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 73 - आँखों को जो............

आँखों को जो सुकून दे  वो दीद दीद है ॥ चंदन का बुरादा भी दिखे 
वरना लीद है ॥ जिस ईद मिले ग़म
 वो है त्योहार मोहर्रम , जिस क़त्ल की रात आए ख़ुशी 
अपनी ईद है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

*मुक्त-मुक्तक : 72 - चेहरा ग़मों से.............

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चेहरा ग़मों से मेरा लगे यूँ घिरा हुआ ॥ जैसे पका पपीता फ़र्श पर गिरा हुआ ॥ मायूसी-ओ-मनहूसियत से सूख यों लगूँ , गन्ना हूँ जैसे चार बार का पिरा हुआ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 71 - पानी न पीऊँगा..............

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पानी न पिऊँगा हो गर शराब सामने ॥ ताकूँ कनेर क्यों हो जब गुलाब सामने ॥ फाँकूँ मैं चने क्यों मैं चाटूँ बस अचार को , रक्खे हों तश्तरी में जब कबाब सामने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 70 - अब जब दाँत............

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अब जब दाँत रहे न बाक़ी पान सुपाड़ी लाये हो ॥ पीने वाला उठ बैठा जब दारू ताड़ी लाये हो ॥ करवाया तब ख़ूब सफ़र पैदल जब छाले पाँव में थे , अब क्या मतलब मंज़िल पर तुम मोटर गाड़ी लाये हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 69 - लोग थक जातेहैं...........

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 लोग थक जाते हैं हम तो
 तेज़ रफ़्तार हो गए ॥ जबसे सच तेरी मोहब्बत में 
गिरफ़्तार हो गए ॥ इस क़दर तुझसे हुए हम 
बावफ़ा ईमानदार , अपने से, अपनों से,
दुनिया भर से ग़द्दार हो गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 68 - उसने जब माँगा .............

उसनेजब माँगा मकाँ
मैंने उसे इक घर दिया
उसको कब तक्लीफ़ दी
ख़ुद उसके घर जाकर दिया ॥
एक दिन मुझको ज़रूरत
पड़ गई थी टाँग की,
उसने भी लाकर मुझे
इक ख़ूबसूरत पर दिया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 67 - सामान यक़ीनन...............

सामान यक़ीनन कुछ 
कम दाम का निकलेगा ॥ लेकिन कबाड़ में भी 
कुछ काम का निकलेगा ॥ तलवार शिवाजी की,
टीपू की न मिले पर , चाकू, छुरी, सुई, पिन 
हर आम का निकलेगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

55 : ग़ज़ल - हाँ ! मुझसे बेपनाह मोहब्बत

हाँँ ! मुझसे बेपनाह मोहब्बत न करो तुम ।। लेकिन ख़ुदा के वास्ते नफ़्रत न करो तुम ।।1।। यों दुश्मनी निभाओ लड़ो , काट दो गर्दन , बस दिल को मेरे बारहा आहत न करो तुम ।।2।। ख़िदमत में मेरी जान भी हाज़िर है , कभी भी
ईमान और दीन की चाहत न करो तुम ।।3।। सच ख़ूब क़हर ढाओ कि ख़ुद्दार हूँ मुझ पर ,
एहसान की तो भूल के जुरअत न करो तुम ।।4।। बस इतनी मेहरबानी करो मुझपे क़सम से , इतनी सी भी मेरे लिए ज़हमत न करो तुम ।।5।।
हूँ रीछ ज़ात मेरे घने बाल हैं लेकिन , भेड़ों के बदले मेरी हज़ामत न करो तुम ।।6।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 66 - देखने में सभ्य..................

देखने में सभ्य 
अंदर जंगली है आदमी ॥
शेर चीते से खतरनाक  और बली है आदमी ॥
जानवर तो प्रकृति का 
अपनी अनुपालन करें , 
अपने मन मस्तिष्क के 
कारण छली है आदमी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

54 : ग़ज़ल - बहुत चाहत है

बहुत चाहत है वो बोलूँ , मगर जो कहना मुश्किल है ।।
है जिनसे बोलना उनका , भी उसको सुनना मुश्किल है ।।1।।
मुझे करना है इज़्हारे , तमन्ना अपने दुश्मन से , ज़ुबाँ खुलती नहीं और बिन , कहे भी रहना मुश्किल है ।।2।।  हैं माहिर लोग ग़ैरों को , भी सब अपना बनाने में , यहाँ अपनों को भी अपना , बनाए रखना मुश्किल है ।।3।। कहाँ होती हैं दुनिया में , सभी की ख़्वाहिशें पूरी , अधूरे ख़्वाब ले फिर ज़िंदगी जी सकना मुश्किल है ।।4।। न कर नाहक़ लतीफ़ागोई मैं ग़मगीन हूँ इतना , हँसी की बात पर भी आज मेरा हँसना मुश्किल है ।।5।। करो करते रहो मुझ पर , जफ़ा जी भर इजाज़त है , सितम तो जब कोई अपना , करे तब सहना मुश्किल है ।।6।। चपत दिखलाएगा दुश्मन , तो मैं तो लात जड़ दूँगा , मेरा इस दौर में गाँधी , सरीखा बनना मुश्किल है ।।7।। बहुत आसान है देना , सलाहें वो भी बिन माँगे , मगर हालात के मारों , का उन पर चलना मुश्किल है ।।8।। अगर जाना है रेगिस्तान फ़ौरन ऊँट बन जाओ , वहाँ मेंढक या मछली का , क़दम भर चलना मुश्किल है ।।9।। ( लतीफ़ागोई = चुटकुला सुनाना ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

53 : ग़ज़ल - मुद्दत से बंद अपना मुँह

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मुद्दतसे बंद अपना , मुँह खोल मैं रहा हूँ ।। हर लफ़्ज़ अब क़सम से , सच बोल मैं रहा हूँ ।।1।। उनके भले की ख़ातिर , बेशक़ दग़ा है लेकिन , खोल अपने दोस्त की ही , अब पोल मैं रहा हूँ ।।2।। मुझमें कोई कहाँ है , कब लोग जान पाए ? कंचे सा जो हमेशा , ही गोल मैं रहा हूँ ।।3।। जिनकी निगाह में अब , क़ीमत रही न अपनी , कल तक जहाँ में सबसे , अनमोल मैं रहा हूँ ।।4।। इक रोज़ में तुम उसका , लेने को राज़ आए ,
जिसको न जाने कब से , नित टोल मैं रहा हूँ ।।5।। चाहत के कुछ मुताबिक़ , इसमें न कोई डाले  , दरवेश का जो ख़ाली , कजकोल मैं रहा हूँ ।।6।। वादा तेरी मदद का , भूला नहीं हूँ लेकिन , हालात हैं कुछ ऐसे , सो डोल मैं रहा हूँ ।।7।। सस्ते में बेचकर भी , होता नहीं है नुक़्साँ ,
सौदा हर इक शुरू से , कम तोल मैं रहा हूँ ।।8।। ( टोल = टटोल , कजकोल=भिक्षा पात्र ) - डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 65 - काट लो मेरी...............

काट लो मेरी गर्दन को 
तलवार से ॥
कर लो जी भर गुसल 
ख़ून की धार से ॥ जो भी करना है 
खुलकर करो हाँ मगर , नाजुकी से बहुत 
और बड़े प्यार से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

52 : ग़ज़ल - मैं तमन्नाई हूँ

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मैं तमन्नाई हूँ कि मुझको लोरियाँ मिलतीं ।। 
नींद आए न नींद वाली गोलियाँ मिलतीं ।।1।।
जिसको देखो वो तुर्श होके बात करता है ,
क्यों नहीं कोयलों सी सबमें बोलियाँ मिलतीं ।।2।।
सिर्फ़ चाहत है लाल-लाल बेरियों की पर ,
मुझको कच्ची हरी-हरी निबोलियाँ मिलतीं ।।3।।
लोग पिल्लों को पालते बड़ी मोहब्बत से ,
काश लवारिसों को ऐसी गोदियाँ मिलतीं ।।4।।
इश्क़ करने को तो मिलें ज़रा सी कोशिश में ,
ब्याह बेकार से न करने गोरियाँ मिलतीं ।।5।।
मुफ़्लिसों को चबाने बासी रोटियाँ मुश्किल ,
पाले कुत्तों को ताज़ा गोश्त-बोटियाँ मिलतीं ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति