17. मुक्त-ग़ज़ल : गरम दोपहर को.....................


 गर्म  दोपहर  को  बर्फानी  माहताब   रहूँ II

सर्द  रातों  को  गर्मागर्म  आफताब  रहूँ II

अपनी तासीर है ऐसी कि प्यासे को पानी ,
सख्त मैकश को बियर व्हिस्की रम शराब रहूँ II

उनकी चोली नहीं कुरता न सही कम अज कम ,
उनकी चाहत में उनकी जूती या जुराब रहूँ II

जाने क्या है कि ज़माने को मैं जँचूँ लेकिन ,
उनकी नज़रों में सबसे बद -बुरा -ख़राब रहूँ II

खुद को भी मैं न मयस्सर हूँ एक पल के लिए ,
उनके हर हुक्म को हर वक्त दस्तयाब रहूँ II
( दस्तयाब=उपलब्ध )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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